अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार मार्च वर्ष का तीसरा महीना होता है। यह महीना ऋतु परिवर्तन का संकेत देता है और आध्यात्मिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। मार्च 2026 के तीसरे सप्ताह में कई प्रमुख व्रत और त्योहार पड़ रहे हैं, जिनमें कृष्ण नृसिंह द्वादशी, पापमोचनी एकादशी, गुड़ी पड़वा, चैत्र नवरात्रि, गणगौर और अन्य शामिल हैं। इन व्रत-पर्वों का सनातन परंपरा में विशेष स्थान है, जो भक्तों के जीवन में श्रद्धा, अनुशासन, सकारात्मक ऊर्जा और मानसिक शांति का संचार करते हैं। आइए इस आर्टिकल में मार्च 2026 के तीसरे सप्ताह में आने वाले प्रमुख व्रत और त्योहारों के साथ-साथ उनके धार्मिक महत्व के बारे में विस्तार से जानते हैं।
15 मार्च 2026 के व्रत और त्योहारों के बारे में यहां पूरी जानकारी दी गई है:
कृष्ण नृसिंह द्वादशी - हिंदू पंचांग के अनुसार, फाल्गुन शुक्ल द्वादशी के लगभग पंद्रह दिन बाद आने वाली कृष्ण पक्ष की द्वादशी को कृष्ण नृसिंह द्वादशी कहा जाता है। इस दिन भगवान विष्णु के भक्त उनके नृसिंह रूप की पूजा और आराधना करते हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान नृसिंह का अवतार हिरण्यकशिपु का संहार करने के लिए हुआ था। मान्यता है कि इस व्रत से व्यक्ति निर्भय और पराक्रमी बनता है, जन्म-मरण के बंधनों से मुक्त होता है और सद्गति प्राप्त करता है। कृष्ण नृसिंह व्रत की विधि फाल्गुन शुक्ल द्वादशी के व्रत के समान ही होती है।
मीन संक्रांति - चैत्र महीने में सूर्य देव मीन राशि में गोचर करेंगे और इसी तिथि से खरमास की शुरुआत होती है। संक्रांति के दिन स्नान, ध्यान, पूजा, जप-तप और दान का विशेष महत्व है। ज्योतिषीय गणना के अनुसार, सूर्य देव 14 मार्च तक कुंभ राशि में रहेंगे और 15 मार्च को रात 1 बजकर 8 मिनट पर मीन राशि में प्रवेश करेंगे।
पापमोचनी एकादशी - हर साल चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि के अगले दिन पापमोचनी एकादशी मनाई जाती है। इस दिन लक्ष्मी नारायण जी की पूजा की जाती है और एकादशी का व्रत रखा जाता है। मान्यता है कि इस व्रत से साधक की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं और जाने-अनजाने में किए गए पाप नष्ट हो जाते हैं।
16 मार्च 2026 के व्रत और त्योहारों के बारे में यहां पूरी जानकारी दी गई है:
सोम प्रदोष व्रत - सोम प्रदोष व्रत भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित एक अत्यंत शुभ व्रत है, जो कृष्ण या शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी सोमवार को रखा जाता है। इस व्रत को प्रदोष काल (शाम) में पूजा के साथ करने से सुख-समृद्धि, मानसिक शांति और कष्टों का निवारण होता है। इस दिन शिवलिंग पर गंगाजल, दूध, दही, घी, शहद, बेलपत्र और धतूरा अर्पित किया जाता है और ‘ॐ नमः शिवाय’ का जाप किया जाता है। व्रत के दौरान सात्विक भोजन किया जा सकता है या निर्जला उपवास रखा जा सकता है। कथा सुनना या पढ़ना भी अत्यंत फलदायी माना जाता है। इस दिन शिव-शक्ति की कृपा से जीवन के रोग, भय और क्लेश दूर होते हैं।
17 मार्च 2026 के व्रत और त्योहारों के बारे में यहां पूरी जानकारी दी गई है:
मासिक शिवरात्रि - शिव पुराण के अनुसार मासिक शिवरात्रि प्रत्येक माह कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाई जाती है। यह दिन भगवान शिव की विशेष उपासना के लिए अत्यंत पुण्यकारी माना गया है। मान्यता है कि मासिक शिवरात्रि पर व्रत, रात्रि जागरण और शिवलिंग का अभिषेक करने से शिव कृपा प्राप्त होती है, कष्टों का नाश होता है और साधक को आध्यात्मिक शांति की अनुभूति होती है।
18 मार्च 2026 के व्रत और त्योहारों के बारे में यहां पूरी जानकारी दी गई है:
दर्श अमावस्या - दर्श अमावस्या हिंदू पंचांग की वह अमावस्या तिथि है, जिस दिन पितृ तर्पण, श्राद्ध और दान-पुण्य का विशेष महत्व होता है। धर्मग्रंथों के अनुसार इस दिन पवित्र नदियों में स्नान, पितरों का स्मरण और दान करने से पितृ दोष शांत होता है तथा कुल की उन्नति होती है। दर्श अमावस्या को आध्यात्मिक शुद्धि और पितृ कृपा प्राप्ति का पावन अवसर माना गया है।
19 मार्च 2026 के व्रत और त्योहारों के बारे में यहां पूरी जानकारी दी गई है:
गुड़ी पड़वा - गुड़ी पड़वा या संवत्सर पड़वो महाराष्ट्र और कोंकण के निवासियों द्वारा वर्ष के प्रथम दिन के रूप में मनाया जाता है, जब नया संवत्सर शुरू होता है। यह साठ वर्षों के चक्र का हिस्सा होता है, जिनमें प्रत्येक वर्ष का अलग नाम होता है। कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में इसे उगादी के रूप में मनाया जाता है और गुड़ी पड़वा एवं उगादी दोनों एक ही दिन आते हैं। चंद्र-सौर कैलेंडर के अनुसार गुड़ी पड़वा मराठी नव वर्ष है, जबकि सूर्य की स्थिति पर आधारित सौर कैलेंडर पर हिन्दू नव वर्ष को तमिलनाडु में पुथन्डु, असम में बिहू, पंजाब में वैसाखी, उड़ीसा में पणा संक्रांति और पश्चिम बंगाल में नब बरस के नाम से मनाया जाता है।
चैत्र नवरात्रि - चैत्र नवरात्रि में शारदीय नवरात्रि की तरह ही अधिकांश रीति-रिवाज और अनुष्ठानों का पालन किया जाता है। नवरात्रि के आरंभ में घटस्थापना करना अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि यह नौ दिवसीय उत्सव की शुरुआत का प्रतीक है। शास्त्रों में घटस्थापना के समय और नियम स्पष्ट किए गए हैं और अमावस्या या रात्रिकाल में इसे करना वर्जित माना गया है। प्रतिपदा तिथि के दिन का पहला एक तिहाई भाग सबसे शुभ माना जाता है, और यदि यह समय न मिले तो अभिजित मुहूर्त में भी घटस्थापना की जा सकती है। घटस्थापना के समय चित्रा नक्षत्र और वैधृति योग से बचने की सलाह दी जाती है। इसे हिंदू परंपरा में मध्याह्न से पूर्व प्रतिपदा के समय करना शुभ होता है।
चैत्र अमावस्या - हर साल चैत्र महीने की अमावस्या का सनातन धर्म में विशेष महत्व है। यह दिन पितरों को समर्पित होता है और लोग इस अवसर पर पूजा-अर्चना करते हैं। इस दिन किसी भी शुभ कार्य से परहेज़ करना चाहिए, क्योंकि ऐसा करने पर विघ्न आ सकते हैं। पितृ दोष से मुक्ति चाहने वालों को सुबह उठकर सूर्य देव को अर्घ्य देना चाहिए और उसके बाद पितरों का तर्पण या पिंडदान किसी योग्य पुरोहित की मौजूदगी में करना चाहिए। इसके बाद पितृ चालीसा का पाठ और वैदिक मंत्रों का जाप करने से पितृ दोष का प्रभाव कम होता है और पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है।
20 मार्च 2026 के व्रत और त्योहारों के बारे में यहां पूरी जानकारी दी गई है:
झूलेलाल जयंती - चैत्र शुक्ल द्वितीया से सिंधी नववर्ष की शुरुआत होती है और इसी दिन भगवान झूलेलाल का जन्मोत्सव मनाया जाता है, जिसे झूलेलाल जयंती कहा जाता है। चैत्र मास को सिंधी में चेट और चांद को चण्ड कहा जाता है। इस पर्व के पीछे पौराणिक मान्यता है कि यह अवतारी युगपुरुष भगवान झूलेलाल के जन्म दिवस के रूप में मनाया जाता है।
चंद्र दर्शन - चंद्र दर्शन वह धार्मिक अनुष्ठान है जिसमें चंद्रमा को देखकर पूजन, मंत्र जाप या प्रार्थना की जाती है। मान्यता है कि चंद्र दर्शन से मनोकामनाएं पूरी होती हैं, मानसिक शांति मिलती है और व्रत का फल अधिकाधिक प्राप्त होता है।
21 मार्च 2026 के व्रत और त्योहारों के बारे में यहां पूरी जानकारी दी गई है:
मत्स्य जयंती - मत्स्य जयन्ती भगवान विष्णु के मत्स्य अवतार के जन्म दिवस के रूप में मनाई जाती है और हिन्दू पंचांग के अनुसार इसे चैत्र शुक्ल तृतीया को रखा जाता है। मत्स्य अवतार सत्ययुग में भगवान विष्णु का पहला अवतार था, जिसमें वे मछली के रूप में प्रकट होकर राजा सत्यव्रत, प्रजापतियों और सप्तर्षियों को जलप्रलय से बचाते हैं। इसके अलावा, हयग्रीव राक्षस द्वारा चोरी किए गए वेदों को पुनः प्राप्त करने के लिए भी विष्णु ने मत्स्य रूप धारण किया था।
गौरी पूजा/ गणगौर - चैत्र माह शुक्ल तृतीया को हिन्दू पंचांग के अनुसार गणगौर मनाया जाता है। गणगौर में ‘गण’ का अर्थ भगवान शिव और ‘गौर’ का अर्थ माता पार्वती है। इस दिन अविवाहित कन्याएँ और विवाहित स्त्रियाँ शिव-पार्वती की पूजा करती हैं। मान्यता है कि इस व्रत से अविवाहित कन्याओं को मनचाहा वर और विवाहित स्त्रियों के पतियों को दीर्घायु व स्वास्थ्य मिलता है। गणगौर पूजन में महिलाएँ बालू या मिट्टी से गौरा जी की प्रतिमा बनाकर उनका श्रृंगार करती हैं और लोकगीतों के साथ पूजन करती हैं। व्रतोत्सव संग्रह के अनुसार इस दिन केवल एक समय दुग्ध ग्रहण करके उपवास रखने से पति और संतान का अक्षय सुख प्राप्त होता है। इस व्रत की एक खास बात यह है कि इसे पति से छुपाकर किया जाता है और पूजा का प्रसाद भी पति को नहीं दिया जाता।
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