परशुराम जयंती सनातन धर्म का एक अत्यंत पवित्र और प्रभावशाली पर्व है, जो भगवान विष्णु के छठे अवतार भगवान परशुराम के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। यह पर्व वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि यानी अक्षय तृतीया के दिन आता है। यह दिन स्वयं सिद्ध मुहूर्त माना जाता है, जिसमें किए गए शुभ कार्यों का फल कभी समाप्त नहीं होता।
आइए जानते हैं भगवान विष्णु के छठे अवतार श्री परशुराम जी के बारे में विस्तार से ...
भगवान परशुराम का जन्म महर्षि जमदग्नि और माता रेणुका के घर हुआ। उनका प्रारंभिक नाम राम था। वे भार्गव वंश के तेजस्वी ऋषि थे, जिनमें ब्राह्मण का ज्ञान और क्षत्रिय का पराक्रम दोनों मौजूद थे।
उन्होंने भगवान शिव की कठोर तपस्या कर उन्हें प्रसन्न किया। प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें दिव्य अस्त्र परशु प्रदान किया। इसी अस्त्र के कारण वे परशुराम यानी परशु धारण करने वाले राम कहलाए।
धार्मिक कथाओं के अनुसार, ऋषि ऋचीक ने अपनी पत्नी सत्यवती और उनकी माता के लिए विशेष यज्ञ द्वारा प्रसाद तैयार किया था। लेकिन परिस्थितियों के कारण वह प्रसाद आपस में बदल गया।
इसका परिणाम यह हुआ कि सत्यवती के गर्भ से जन्म लेने वाले पुत्र में क्षत्रिय जैसे गुण आए, जबकि क्षत्रिय कुल में जन्म लेने वाले में ब्राह्मण गुण आए। आगे चलकर सत्यवती के पुत्र जमदग्नि हुए और उनके पुत्र के रूप में भगवान परशुराम का जन्म हुआ - जिनमें ब्राह्मण और क्षत्रिय दोनों के गुण स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं।
जब भगवान परशुराम शिवजी से मिलने कैलाश पहुंचे, तो द्वार पर भगवान गणेश पहरा दे रहे थे। उन्होंने परशुराम को अंदर जाने से रोका।
इस पर क्रोधित होकर परशुराम ने अपने परशु से उन पर प्रहार किया, जिससे गणेश जी का एक दांत टूट गया। इसी घटना के बाद भगवान गणेश एकदंत कहलाए।
एक समय महर्षि जमदग्नि ने अपनी पत्नी रेणुका के आचरण पर संदेह करते हुए अपने पुत्रों को उन्हें दंड देने का आदेश दिया। किसी भी पुत्र ने यह कार्य नहीं किया, लेकिन परशुराम ने अपने पिता की आज्ञा का पालन करते हुए अपनी माता का वध कर दिया।
उनकी आज्ञाकारिता से प्रसन्न होकर जमदग्नि ने उन्हें वरदान दिया, जिससे उन्होंने अपनी माता को पुनः जीवित कर दिया।
यह घटना परशुराम की अटल आज्ञापालन और त्याग को दर्शाती है।
राजा सहस्त्रबाहु (कार्तवीर्य अर्जुन) अत्याचारी और अहंकारी बन चुका था। उसने महर्षि जमदग्नि के आश्रम से कामधेनु गाय को बलपूर्वक छीन लिया।
जब परशुराम को यह ज्ञात हुआ, तो उन्होंने सहस्त्रबाहु का वध कर दिया। इसके प्रतिशोध में सहस्त्रबाहु के पुत्रों ने जमदग्नि की हत्या कर दी।
इस घटना से क्रोधित होकर परशुराम ने प्रतिज्ञा ली कि वे पृथ्वी को अत्याचारी क्षत्रियों से मुक्त करेंगे और उन्होंने 21 बार पृथ्वी को क्षत्रिय विहीन कर अपनी प्रतिज्ञा पूर्ण की।
क्षत्रियों का संहार करने के बाद भगवान परशुराम ने सम्पूर्ण पृथ्वी कश्यप ऋषि को दान कर दी और स्वयं तपस्या में लीन हो गए।
कथाओं के अनुसार, उन्होंने समुद्र को पीछे हटाकर नई भूमि (आज का केरल क्षेत्र) भी उत्पन्न की। इसके बाद वे महेंद्र पर्वत पर तप करने लगे।
भगवान परशुराम को सप्त चिरंजीवियों में स्थान प्राप्त है। वे अमर हैं और कलियुग के अंत तक जीवित रहेंगे।
महाभारत काल में उन्होंने भीष्म पितामह और कर्ण जैसे महान योद्धाओं को शिक्षा दी। वे सदैव धर्म की रक्षा और नीति के पालन के लिए समर्पित रहे।
परशुराम जयंती हमें यह सिखाती है कि
👉 अन्याय के खिलाफ खड़े होना चाहिए
👉 शक्ति का उपयोग केवल धर्म के लिए होना चाहिए
👉 अहंकार का अंत निश्चित है
👉 सत्य और कर्तव्य ही जीवन का आधार हैं
यह दिन उन लोगों के लिए विशेष प्रेरणादायक है जो समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाना चाहते हैं।भगवान परशुराम का जीवन धर्म, साहस और त्याग का प्रतीक है।
परशुराम जयंती पर परशुराम चालीसा और परशुराम जी आरती का गायन और पाठ जरुर करना चाहिए। इस बार परशुराम जयंताी 19 अप्रैल 2026 के दिन मनाई जाएगी, इस दिन अक्षय तृतीया का पर्व भी मनाया जाता है।