वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को अक्षय तृतीया अथवा आखा तीज के नाम से जाना जाता है। ये दिन अत्यंत ही शुभ होता है और इसके नाम अक्षय के अनुरूप इस दिन जो भी कार्य किया जाए उसका फल कभी भी नष्ट नहीं होता। वैदिक ज्योतिष अक्षय तृतीया को सभी कु-प्रभावों से मुक्त शुभ दिन मानते हैं, ये एक अबुक्ष और स्वयंसिद्धि मुहूर्त है अतः इस दिन किसी भी शुभ कार्य को प्रारंभ करने के लिए किसी भी मुहूर्त की आवश्यकता नहीं होती। इस दिन जप, यज्ञ, पितृ-तर्पण, दान-पुण्य अधिक से अधिक करना चाहिए, अक्षय तृतीया को परशुराम जयंती के रूप में भी मनाया जाता है। पुराणों में वर्णन मिलता है कि अक्षय तृतीया के दिन कनकधारा स्तोत्र का पाठ अवश्य करना चाहिए।
>अक्षय तृतीया की कथा सुनाते हुए भगवान श्री कृष्ण धर्मराज से कहते हैं कि से कहा कि "प्राचीन समय में महोदय नाम का एक वैश्य हुआ। वह अत्यंत सत्यनिष्ठ, विनम्र वाणी वाला, पवित्र स्वभाव का तथा देवताओं और ब्राह्मणों का आदर करने वाला व्यक्ति था। उसे पुण्य कथाएँ और धर्म से जुड़े प्रसंगों को सुनना सदैव पसंद था। जब भी उसे अपने कार्यों से थोड़ा समय मिलता, वह सत्संग और शास्त्र श्रवण में लग जाता। अन्य कार्यों में व्यस्त रहने पर भी उसका मन सदैव धर्म और शास्त्र चिंतन में ही लीन रहता था।
एक दिन मार्ग में चलते हुए उसने कुछ ऋषियों को अक्षय तृतीया के महत्व का वर्णन करते सुना, जो रोहिणी नक्षत्र के साथ पड़ रही थी। ऋषि बता रहे थे कि जब अक्षय तृतीया बुधवार के दिन आती है, तब इसका फल अनंत और अत्यंत शुभ होता है। इसी पावन तिथि पर भगवान नर-नारायण, हयग्रीव तथा परशुराम का अवतार हुआ था। इस दिन किए गए दान, हवन, पूजन और तर्पण का फल कभी नष्ट नहीं होता। देवताओं और पितरों के निमित्त किए गए सभी कार्य अक्षय फल प्रदान करते हैं।
ऋषियों से यह महिमा सुनकर महोदय के मन में विचार आया कि उसे भी यह व्रत अवश्य करना चाहिए। वह तुरंत गंगा तट पर पहुँचा और पवित्र गंगाजल से अपने पितरों का तर्पण किया। इसके बाद घर लौटकर उसने अपनी सामर्थ्य के अनुसार जल से भरे घड़े, शक्कर, नमक, जौ, गेहूँ, दही-चावल, गन्ना और विभिन्न दुग्ध पदार्थ श्रद्धा सहित ब्राह्मणों को दान किए।
लेकिन इन सब से इतर महोदय की पत्नी सांसारिक मोह में फंसी हुई थी और वह अपने पति को दान-पुण्य करने से रोकने का प्रयास करती रहती थी। किंतु महोदय उदार और दयालु स्वभाव का होने के कारण धर्म कर्म में निरंतर लगे रहते थे। अंततः उन्होंने प्रभु का स्मरण करते हुए अपना जीवन पूर्ण किया और उन्हें उत्तम गति प्राप्त हुई।
हे युधिष्ठिर! अगले जन्म में वही महोदय कुशावतीपुरी में एक क्षत्रिय के रूप में जन्मे। इस जन्म में उन्हें अपार धन-संपत्ति और सुख की प्राप्ति हुई। उन्होंने उस संपत्ति का सदुपयोग करते हुए अनेक यज्ञ और हवन किए तथा ब्राह्मणों को उत्तम दक्षिणा दी। उन्होंने गौदान, स्वर्णदान, अन्नदान और अन्य अनेक दान किए। गरीबों, याचकों और नेत्रहीनों की सहायता भी की। इतना दान करने पर भी उनकी संपत्ति कभी समाप्त नहीं हुई। यह सब उनके पूर्व जन्म में किए गए अक्षय तृतीया व्रत का प्रभाव था।
उन्होंने अपने पूर्व जन्म में धन और ऐश्वर्य के मोह को त्यागकर निष्काम भाव से धर्म कार्य किए थे, जिसके फलस्वरूप उन्हें इस जन्म में अक्षय समृद्धि प्राप्त हुई।
इस दिन प्रातः स्नान करके भगवान श्री लक्ष्मी-नारायण की पूजा करनी चाहिए तथा पितरों का तर्पण करना चाहिए। दिन में एक ही समय भोजन करना चाहिए। अक्षय तृतीया पर जौं का हवन किया जाता है। साथ ही जल से भरे घड़े, स्वर्ण सहित पात्र, छह प्रकार के अन्न, जौ, गेहूँ, चना, सतुआ और दही-चावल का दान करना चाहिए। ग्रीष्म ऋतु में उत्पन्न फलों का दान भी अत्यंत पुण्यदायक माना गया है।
यदि वैशाख शुक्ल तृतीया रोहिणी नक्षत्र के साथ हो, तो भगवान शिव की विशेष पूजा की जाती है और जल से भरे घट का दान किया जाता है। ऐसा करने से शिवलोक की प्राप्ति होती है।
एष धर्मघटो दत्तो ब्रह्मविष्णुशिवात्मकः।
अस्य प्रदानात्तृप्यन्तु पितरोऽपि पितामहाः॥
गन्धोदकतिलैमिश्रं सान्नं कुम्भं साक्षिणाम्।
पितृभ्यः सम्प्रदास्यामि अक्षय्यमूपतिष्ठतु॥
अर्थात - मैं यह धर्मघट ब्रह्मा, विष्णु और शिव स्वरूप मानकर दान करता हूँ। इस दान से मेरे पितर और पितामह संतुष्ट हों। गंध, जल, तिल और अन्न सहित यह घट मैं पितरों को अर्पित करता हूँ, यह दान अक्षय हो।
हे निष्पाप! इस दिन छत्र, जूते, गौ, भूमि, स्वर्ण और वस्त्र आदि जो भी वस्तुएँ भगवान को अर्पित करके दान की जाती हैं, वे अक्षय फल प्रदान करती हैं। इस दिन किया गया जप, तप, हवन और दान कभी व्यर्थ नहीं जाता और सदा फलदायी रहता है। इसी कारण यह तिथि “अक्षय तृतीया” कहलाती है।
विष्णुधर्मोत्तर पुराण में भी अक्षय तृतीया के व्रत का वर्णन प्राप्त होता है। विष्णुधर्मोत्तर पुराण के अनुसार, वैशाख शुक्ल तृतीया के दिन उपवास करने से अक्षय पुण्य प्राप्त होता है। कृत्तिका नक्षत्र से युक्त होने पर इसका प्रभाव अधिक हो जाता है तथा किए गये समस्त शुभ कर्मों का अक्षय फल प्राप्त होता है। पुराणानुसार अक्षय तृतीया के व्रत में भगवान की अक्षत से पूजा-अर्चना की जाती है। जो मनुष्य इस तिथि में तीर्थ जल से स्नान करके, भगवान विष्णु को अक्षत, सत्तू अर्पित करता है तथा सत्तू एवं अक्षत का हवन करके सत्तू व पक्वान्न ब्राह्मणों को अर्पित करता है, वह अक्षय पुण्य फल प्राप्त करता है।
हे भृगुनन्दन! जो उपरोक्त विधान का पालन करते हुए एक भी तृतीया का व्रत का पालन कर लेता है, उसे समस्त तीजों के व्रत का फल प्राप्त होता है। इस प्रकार विष्णुधर्मोत्तर पुराण में वर्णित अक्षय तृतीया व्रत सम्पूर्ण हुआ।