अधिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि पद्मिनी एकादशी के नाम से जानी जाती है। यह एकादशी अत्यंत विशिष्ट और दुर्लभ मानी गई है, क्योंकि इसका संयोग लगभग तीन वर्ष में केवल एक बार आता है। भगवान श्रीविष्णु को समर्पित यह पावन व्रत अपार पुण्य, सुख-समृद्धि, संतान सुख तथा मोक्ष प्रदान करने वाला माना गया है। मान्यता है कि इस एकादशी का श्रद्धापूर्वक व्रत करने से मनुष्य को यज्ञ, तपस्या, दान और तीर्थों के समान पुण्य फल प्राप्त होता है। भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को इस एकादशी का महत्व, व्रत विधान तथा इसकी महिमा का विस्तारपूर्वक वर्णन किया। आइए पढ़ते हैं पद्मिनी एकादशी की पावन कथा-
बोलिए श्री लक्ष्मी-नारायण भगवान की जय!!
श्री कृष्ण से संवाद करते हुए अर्जुन ने पूछा - हे प्रभु! अधिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का क्या नाम है तथा उसका माहात्म्य क्या है? इस व्रत को किस प्रकार किया जाता है और इससे क्या फल प्राप्त होता है? कृपा कर विस्तारपूर्वक बताइये।
श्रीकृष्ण बोले - हे अर्जुन! अधिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का नाम पद्मिनी है। यह एकादशी अत्यंत पुण्यदायी, दुर्लभ और भगवान श्रीहरि को प्रिय है। इस व्रत को करने वाला मनुष्य सभी पापों से मुक्त होकर विष्णुलोक को प्राप्त करता है।
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि इस व्रत का विधान अत्यंत पवित्र माना गया है। दशमी तिथि से ही व्रत के नियम प्रारम्भ हो जाते हैं। इस दिन तामसिक भोजन, मसूर, चना, शहद, मांस तथा पराये अन्न का त्याग करना चाहिए। भूमि पर शयन करना तथा ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए।
एकादशी के दिन प्रातःकाल स्नान करके भगवान श्रीविष्णु का विधिपूर्वक पूजन करना चाहिए। धूप, दीप, पुष्प, नैवेद्य तथा तुलसी दल अर्पित करके भगवान का स्मरण करना चाहिए। इस दिन भजन-कीर्तन, कथा श्रवण तथा रात्रि जागरण का विशेष महत्व बताया गया है। जो भक्त श्रद्धा और भक्ति के साथ रात्रि में जागरण करते हैं, उन्हें अनेक यज्ञों और तीर्थों के समान पुण्य प्राप्त होता है।
भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया कि पद्मिनी एकादशी का व्रत जप, तप, दान और यज्ञ से भी बढ़कर फल प्रदान करने वाला माना गया है। इस व्रत के प्रभाव से मनुष्य को दुर्लभ वस्तुओं की प्राप्ति होती है तथा उसके जीवन के समस्त कष्ट दूर हो जाते हैं।
इसके बाद श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कार्तवीर्य अर्जुन की उत्पत्ति की कथा सुनाई। प्राचीन समय में महिष्मती नगरी में एक राजा राज्य करता था, जिसकी अनेक रानियाँ थीं, किन्तु उसे संतान सुख प्राप्त नहीं था। पुत्र प्राप्ति की इच्छा से राजा और उसकी रानी ने कठोर तपस्या की, परन्तु उन्हें सफलता नहीं मिली।
एक दिन रानी ने महासती अनसूया से अपनी पीड़ा बताई। तब देवी अनसूया ने उन्हें अधिक मास की पद्मिनी एकादशी का व्रत करने का उपदेश दिया और उसका सम्पूर्ण विधान बताया। रानी ने श्रद्धापूर्वक पद्मिनी एकादशी का व्रत किया, रात्रि में जागरण किया तथा भगवान श्रीविष्णु की आराधना की।
रानी की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु प्रकट हुए और वरदान माँगने को कहा। तब रानी ने अपने पति के लिए श्रेष्ठ और अजेय पुत्र की कामना की। भगवान श्रीहरि ने प्रसन्न होकर उन्हें वरदान दिया। समय आने पर उनके यहाँ कार्तवीर्य अर्जुन नामक तेजस्वी और पराक्रमी पुत्र का जन्म हुआ, जिसने आगे चलकर रावण तक को पराजित किया। यह सब पद्मिनी एकादशी व्रत के प्रभाव से ही संभव हुआ।
श्रीकृष्ण बोले - हे अर्जुन! जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक पद्मिनी एकादशी का व्रत करते हैं, वे इस लोक में सुखों को भोगकर अन्त में विष्णुलोक को प्राप्त करते हैं। इस व्रत के पठन, श्रवण और पालन से मनुष्य के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।
अधिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को पद्मिनी एकादशी कहा जाता है। यह एकादशी भगवान श्रीविष्णु को अत्यंत प्रिय तथा अत्यधिक पुण्य प्रदान करने वाली मानी गई है। इस व्रत के प्रभाव से मनुष्य को सुख, समृद्धि, संतान सुख, पुण्य और भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है।
इस व्रत का पालन करने से मनुष्य के पाप नष्ट होते हैं तथा उसे यज्ञ, तपस्या, दान और तीर्थों के समान पुण्य प्राप्त होता है। रात्रि जागरण, कथा श्रवण और भगवान श्रीहरि की पूजा का इस दिन विशेष महत्व बताया गया है।
पद्मिनी एकादशी का व्रत करने से जीवन के कष्ट दूर होते हैं तथा मनुष्य अन्त में विष्णुलोक को प्राप्त करता है।
पद्मिनी एकादशी अधिक मास के शुक्ल पक्ष में आती है।
यह एकादशी भगवान श्रीविष्णु को अत्यंत प्रिय मानी गई है।
इस व्रत से पापों का नाश होकर पुण्य और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
रात्रि जागरण, भजन-कीर्तन और भगवान विष्णु की पूजा का विशेष महत्व है।
इस व्रत से संतान सुख, सुख-समृद्धि और मनोवांछित फल प्राप्त होते हैं।
इस कथा के श्रवण और पठन से मनुष्य विष्णुलोक का अधिकारी बनता है।