एक बार माता पार्वती ने भगवान गणेश से पूछा, "हे पुत्र! आषाढ़ माह के कृष्ण पक्ष में आने वाली चतुर्थी का क्या महत्व है? इस दिन आपके किस स्वरूप की पूजा की जाती है तथा इस व्रत की कथा और विधि क्या है?"
भगवान गणेश ने कहा, "हे माता! यही प्रश्न कभी धर्मराज युधिष्ठिर ने भी भगवान श्रीकृष्ण से पूछा था। मैं आपको वही पवित्र कथा सुनाता हूँ।"
भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा कि आषाढ़ कृष्ण चतुर्थी के दिन भगवान गणेश 'कृष्णपिंगल' स्वरूप में पूजे जाते हैं। इस दिन श्रद्धापूर्वक उनका व्रत और पूजन करने से सभी विघ्न दूर होते हैं तथा मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
द्वापर युग में माहिष्मति नगरी में एक महीजित नाम के एक धर्मात्मा और न्यायप्रिय राजा राज्य करते थे। वे अपनी प्रजा से पुत्र समान प्रेम करते थे और सदैव धर्म के मार्ग पर चलकर शासन करते थे। उनके राज्य में सुख-शांति और समृद्धि थी, लेकिन एक बात उन्हें हमेशा दुखी करती थी कि उनके कोई संतान नहीं थी।
राजा ने पुत्र प्राप्ति के लिए अनेक यज्ञ, दान, व्रत और तप किए, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। समय बीतता गया और वृद्धावस्था आने लगी। एक दिन राजा ने अपने मंत्रियों, ब्राह्मणों और प्रजाजनों से कहा, "मैंने जीवनभर धर्म का पालन किया, कभी किसी के साथ अन्याय नहीं किया, फिर भी मुझे संतान का सुख क्यों नहीं मिला?"
राजा की पीड़ा सुनकर सभी प्रजाजन उनके लिए उपाय खोजने का निश्चय करके वन की ओर निकल पड़े। वहां उन्हें महान तपस्वी और त्रिकालदर्शी महर्षि लोमश के दर्शन हुए। सभी ने उनका आदरपूर्वक अभिवादन किया और राजा की संतानहीनता का समाधान पूछा।
महर्षि लोमश ने ध्यान लगाकर कहा, "राजा की मनोकामना अवश्य पूरी होगी। इसके लिए उन्हें आषाढ़ कृष्ण चतुर्थी के दिन भगवान कृष्णपिंगल गणेश का विधिपूर्वक व्रत और पूजन करना चाहिए। साथ ही श्रद्धा से ब्राह्मणों को भोजन कराना और वस्त्र आदि का दान देना चाहिए। भगवान गणेश की कृपा से उन्हें योग्य संतान की प्राप्ति होगी।"
प्रजाजन महर्षि का संदेश लेकर महल लौटे और सारी बात राजा महीजित को बताई। राजा ने पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ संकष्टी गणेश चतुर्थी का व्रत किया, भगवान कृष्णपिंगल गणेश की पूजा की तथा ब्राह्मणों को भोजन और दान देकर उनका आशीर्वाद प्राप्त किया।
भगवान गणेश की कृपा से कुछ समय बाद रानी सुदक्षिणा ने एक तेजस्वी और गुणवान पुत्र को जन्म दिया। इस प्रकार राजा की वर्षों पुरानी मनोकामना पूर्ण हुई और पूरा राज्य आनंद से भर गया।
अंत में भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा कि जो श्रद्धालु इस व्रत को विधिपूर्वक करता है तथा इसकी कथा का श्रवण या पाठ करता है, उसके जीवन की विघ्न-बाधाएं दूर होती हैं। भगवान गणेश की कृपा से सुख, समृद्धि, संतान सुख और सभी मनोकामनाओं की प्राप्ति होती है। साथ ही व्यक्ति को अपने कार्यों में सफलता और जीवन में शुभ फल प्राप्त होते हैं।