एक बार सनत्कुमारों ने भगवान शिव से प्रश्न किया, “हे देवाधिदेव महादेव! ऐसा कौन-सा व्रत है जो स्त्रियों को अखण्ड सौभाग्य, सुखी दाम्पत्य, पुत्र-पौत्र और समस्त मंगल प्रदान करता है? कृपा कर उसकी महिमा बताइए।”
सनत्कुमारों के इस प्रसन्न पर भगवान शिव ने वट सावित्री व्रत की कथा प्रारंभ की कहा कि - प्राचीन काल में मद्रदेश में अश्वपति नामक एक धर्मात्मा राजा राज्य करते थे। वे अत्यंत ज्ञानी, पराक्रमी और वेद-वेदांगों के विद्वान थे, किंतु संतान सुख से वंचित थे। संतान प्राप्ति की इच्छा से राजा और उनकी रानी ने देवी सावित्री की कठोर उपासना आरंभ की। राजा प्रतिदिन सावित्री मंत्र का जप करते और अग्नि में आहुति अर्पित करते।
राजा की तपस्या से प्रसन्न होकर स्वयं देवी सावित्री प्रकट हुईं। तेजस्विनी देवी के दर्शन कर राजा अश्वपति भावविभोर हो उठे और साष्टांग प्रणाम कर बोले, “हे जगदम्ब! मुझे पुत्र प्राप्ति का वरदान दीजिए।”
देवी मुस्कुराईं और बोलीं, “हे राजन्! तुम्हें पुत्र नहीं, बल्कि एक दिव्य तेजस्विनी कन्या प्राप्त होगी, जो अपने और अपने पति दोनों कुलों का उद्धार करेगी। उसका नाम भी सावित्री ही होगा।”
कुछ समय पश्चात रानी ने एक सुंदर कन्या को जन्म दिया। कन्या का रूप और तेज इतना अद्भुत था कि उसका सौंदर्य देख सभी चकित रह जाते। जैसे-जैसे वह बड़ी होती गई, उसका तेज चंद्रमा की कलाओं की भाँति बढ़ता गया।
जब सावित्री विवाह योग्य हुईं, तब राजा अश्वपति ने उनसे कहा, “हे पुत्री! तुम स्वयं अपने योग्य वर का चयन करो।” पिता की आज्ञा पाकर सावित्री वृद्ध मंत्रियों के साथ वन-वन भ्रमण करने लगीं।
इसी दौरान उनकी भेंट वन में निवास कर रहे सत्यवान से हुई। सत्यवान राजा द्युमत्सेन के पुत्र थे, जो राज्य खोकर वन में जीवन व्यतीत कर रहे थे। सत्यवान अत्यंत गुणवान, सत्यवादी और धर्मपरायण थे। सावित्री ने मन ही मन उन्हें अपना पति स्वीकार कर लिया।
जब देवर्षि नारद को सावित्री के चयन के बारे में जानकारी हुई, तब उन्होंने राजा अश्वपति से कहा, “सत्यवान सभी गुणों से युक्त हैं, किंतु उनकी आयु केवल एक वर्ष शेष है।”
यह सुनकर राजा अश्वपति चिंतित हो उठे और सावित्री को समझाने लगे, परंतु सावित्री अडिग रहीं। उन्होंने कहा -
“राजा की आज्ञा, पंडित का वचन और कन्यादान केवल एक बार ही होता है। मैंने मन, वचन और आत्मा से सत्यवान को अपना पति स्वीकार कर लिया है, अब मैं किसी अन्य का वरण नहीं कर सकती।”
सावित्री के दृढ़ निश्चय को देखकर राजा ने सत्यवान के साथ उनका विवाह कर दिया। विवाह के बाद सावित्री अपने पति और अंधे सास-श्वसुर के साथ वन में रहने लगीं।
किन्तु देवर्षि नारद की बात सावित्री के मन में निरंतर गूँजती रहती थी। उन्हें ज्ञात था कि सत्यवान की आयु शीघ्र पूर्ण होने वाली है। इसलिए उन्होंने अखण्ड सौभाग्य और पति की दीर्घायु हेतु वट सावित्री व्रत का संकल्प लिया।
निर्धारित दिन सावित्री व्रत कर सत्यवान के साथ वन में गईं। सत्यवान लकड़ियाँ काटने लगे, तभी अचानक उनके सिर में तीव्र पीड़ा हुई। वे सावित्री की गोद में सिर रखकर लेट गए। उसी क्षण यमराज वहाँ प्रकट हुए और सत्यवान के प्राण अपने पाश में बाँधकर दक्षिण दिशा की ओर चल पड़े।
परम पतिव्रता सावित्री भी यमराज के पीछे चल दीं। यमराज ने उन्हें समझाया कि वे लौट जाएँ, पर सावित्री ने धर्म, सत्य और पतिव्रत धर्म का ऐसा अद्भुत वर्णन किया कि यमराज अत्यंत प्रसन्न हो गए।
उन्होंने सावित्री से वर माँगने को कहा। सावित्री ने पहले अपने अंधे श्वसुर की नेत्र ज्योति और उनका खोया राज्य वापस माँगा। यमराज ने “तथास्तु” कहा।
फिर सावित्री ने अपने पति राजा सत्यवान के लिए सौ पुत्रों का वरदान माँगा। यमराज ने वह भी दे दिया।
अंत में सावित्री ने कहा, “हे धर्मराज! आपने मुझे सत्यवान से सौ पुत्रों का वरदान दिया है। बिना पति के यह वरदान कैसे पूर्ण होगा? अतः मेरे पति सत्यवान को जीवनदान दीजिए।”
सावित्री की बुद्धिमत्ता, पतिव्रत और धर्मनिष्ठा से प्रसन्न होकर यमराज ने सत्यवान के प्राण लौटा दिए और उन्हें दीर्घायु का आशीर्वाद दिया।
जब सावित्री और सत्यवान वापस आश्रम पहुँचे, तब द्युमत्सेन की नेत्र ज्योति लौट चुकी थी और उन्हें उनका खोया हुआ राज्य भी पुनः प्राप्त हो गया। आगे चलकर सावित्री और सत्यवान को सौ वीर पुत्रों की प्राप्ति हुई।
भगवान शिव बोले - “हे ब्रह्मन्! यही वट सावित्री व्रत का महान माहात्म्य है। इस व्रत के प्रभाव से अल्पायु पति भी दीर्घायु हो जाता है और स्त्री को अखण्ड सौभाग्य की प्राप्ति होती है। इसलिए सभी स्त्रियों को श्रद्धा और भक्ति से यह व्रत अवश्य करना चाहिए।”
------------------------
अवैधव्यं च सौभाग्यं देहि त्वं मम सुव्रते।
पुत्रान् पौत्रांश्च सौख्यं च गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तु ते॥
अर्थ:
हे सुव्रते (वट वृक्ष), मुझे अखण्ड सौभाग्य, पति की दीर्घायु, पुत्र-पौत्र का सुख और समस्त प्रकार की सुख-समृद्धि प्रदान करें। मैं आपको श्रद्धापूर्वक अर्घ्य अर्पित करती हूँ, आपको बारम्बार नमस्कार है।
॥ इस प्रकार श्री स्कन्दपुराण में वर्णित वट सावित्री व्रत कथा सम्पूर्ण होती है ॥