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अपरा एकादशी व्रत कथा (Apara Ekadashi Vrat Katha)

अपरा एकादशी व्रत कथा (Apara Ekadashi Vrat Katha)

अपरा एकादशी व्रत कथा और महत्व

ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि अपरा एकादशी के नाम से जानी जाती है। यह एकादशी समस्त पापों का नाश करने वाली तथा अपार पुण्य और धन प्रदान करने वाली मानी गई है। भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को इस एकादशी का माहात्म्य बताते हुए इसके पुण्य, महत्व और व्रत विधान का विस्तार से वर्णन किया। आइए पढ़ते हैं अपरा एकादशी की पावन कथा, बोलिए श्री लक्ष्मी-नारायण भगवान की जय!!

संवाद के दौरान अर्जुन बोले – हे प्रभु! ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी का क्या नाम है तथा उसका माहात्म्य क्या है? इसमें किस देवता का पूजन किया जाता है तथा इस व्रत को करने का क्या विधान है? कृपा कर यह सब मुझे विस्तारपूर्वक बताइये।

श्रीकृष्ण बोले – हे अर्जुन! ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम अपरा है। यह एकादशी अपार धन, पुण्य और यश प्रदान करने वाली तथा समस्त पापों का नाश करने वाली है। जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक इस व्रत को करते हैं, उनकी इस लोक में कीर्ति फैलती है और उन्हें भगवान श्रीहरि की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

अपरा एकादशी के व्रत के प्रभाव से ब्रह्महत्या, प्रेतयोनि, दूसरे की निन्दा तथा अनेक भयंकर पापों का नाश हो जाता है। इतना ही नहीं, स्त्रीगमन, झूठी गवाही देना, असत्य भाषण करना, झूठा वेद पढ़ना, मिथ्या शास्त्र बनाना, ज्योतिष द्वारा लोगों को भ्रमित करना तथा झूठा वैद्य बनकर लोगों को ठगना जैसे महापाप भी इस व्रत के प्रभाव से समाप्त हो जाते हैं।

हे धनंजय! युद्धभूमि से भागने वाले क्षत्रिय को नर्क की प्राप्ति होती है, किन्तु यदि वह श्रद्धापूर्वक अपरा एकादशी का व्रत करे तो उसे भी स्वर्ग की प्राप्ति हो जाती है।

जो शिष्य गुरु से विद्या प्राप्त करने के बाद गुरु की निन्दा करते हैं, वे घोर नरक में जाते हैं, किन्तु अपरा एकादशी का व्रत करने से उनके लिये भी स्वर्ग के द्वार खुल जाते हैं।

तीनों पुष्करों में स्नान करने से, कार्तिक मास में पवित्र स्नान करने से, गंगाजी के तट पर पितरों का पिण्डदान करने से जो पुण्य प्राप्त होता है, वही पुण्य अपरा एकादशी का व्रत करने से प्राप्त होता है।

बृहस्पतिवार के दिन गोमती नदी में स्नान करने से, कुम्भ में भगवान केदारनाथजी के दर्शन करने से, बदरिकाश्रम में निवास करने से तथा सूर्य और चन्द्र ग्रहण के समय कुरुक्षेत्र में स्नान करने से जो फल प्राप्त होता है, वही फल अपरा एकादशी के व्रत से मिलता है।

हे पार्थ! हाथी और घोड़े का दान करने से, यज्ञ में स्वर्णदान करने से तथा गौ, भूमि और स्वर्ण के दान से जो पुण्य प्राप्त होता है, वही फल अपरा एकादशी के व्रत के समान माना गया है।

यह एकादशी पापरूपी वृक्षों को काटने के लिये कुल्हाड़ी के समान है तथा पापरूपी अंधकार को नष्ट करने के लिये सूर्य के समान है। इसलिए मनुष्य को इस एकादशी का व्रत अवश्य करना चाहिए।

हे अर्जुन! अपरा एकादशी सभी व्रतों में श्रेष्ठ मानी गई है। इस दिन श्रद्धापूर्वक भगवान श्रीविष्णु का पूजन करने से मनुष्य अन्त में विष्णुलोक को प्राप्त करता है।

हे राजन्! मैंने यह अपरा एकादशी की कथा लोककल्याण के लिये कही है। इसके पठन और श्रवण से मनुष्य सभी पापों से मुक्त होकर पुण्य और मोक्ष को प्राप्त करता है।


अपरा एकादशी व्रत कथा का सारांश

ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को अपरा एकादशी कहा जाता है। “अपरा” का अर्थ है अपार अथवा अतिरिक्त। इस एकादशी का व्रत करने से मनुष्य को अपार पुण्य, धन, यश और भगवान श्रीहरि विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

इस व्रत के प्रभाव से ब्रह्महत्या, निन्दा, असत्य भाषण, झूठी गवाही, गुरु-निन्दा तथा अन्य महापापों का नाश हो जाता है। यहां तक कि युद्धक्षेत्र से भागे हुए क्षत्रिय और पापकर्म में लिप्त मनुष्य भी इस व्रत के प्रभाव से स्वर्ग के अधिकारी बन जाते हैं।

तीर्थ स्नान, पिण्डदान, स्वर्णदान, गोदान, भूमिदान और अनेक महान पुण्य कर्मों के समान फल अपरा एकादशी के व्रत से प्राप्त होता है। यह व्रत पापों का नाश कर मनुष्य को विष्णुलोक की प्राप्ति कराने वाला माना गया है।


सारांश

  • अपरा एकादशी ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष में आती है।

  • यह एकादशी अपार पुण्य और धन प्रदान करने वाली है।

  • इसके व्रत से महापापों का भी नाश हो जाता है।

  • तीर्थ स्नान, दान और यज्ञ के समान पुण्य इस व्रत से प्राप्त होता है।

  • भगवान श्रीविष्णु के पूजन से विष्णुलोक की प्राप्ति होती है।

  • इस कथा के श्रवण और पठन से सभी पाप नष्ट होते हैं।

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