भारत के प्रमुख धार्मिक आयोजनों में जगन्नाथ रथ यात्रा का स्थान अत्यंत विशेष है। उडिसा के पुरी धाम में हर वर्ष आषाढ़ शुक्ल पक्ष की द्वितीया को भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा का भव्य रथ उत्सव निकाला जाता है। वर्ष 2026 में यह यात्रा गुरुवार 16 जुलाई को होगी। पंचांग अनुसार द्वितीया तिथि 15 जुलाई को 11 बजकर 53 मिनट 40 सेकंड से प्रारम्भ होकर 16 जुलाई को 08 बजकर 55 मिनट 29 सेकंड पर समाप्त होगी। इस शुभ समय में भगवान जगन्नाथ नंदी घोष रथ पर सवार होकर गुंडिचा मंदिर के लिए प्रस्थान करते हैं। पूरे विश्व से आने वाले भक्त इस उत्सव में शामिल होकर दिव्य आनन्द का अनुभव करते हैं।
हिन्दू पंचांग प्रणाली के अनुसार जगन्नाथ रथ यात्रा हर वर्ष आषाढ़ शुक्ल पक्ष की द्वितीया को निकाली जाती है। वर्ष 2026 में द्वितीया तिथि 15 जुलाई की दोपहर से आरम्भ होकर 16 जुलाई की प्रातः समाप्त होगी। भगवान जगन्नाथ की यात्रा इसी द्वितीया तिथि में आयोजित होती है। इस दिन तीनों देवताओं के विशाल और आकर्षक रथ पुरी की मुख्य सड़कों पर खींचे जाते हैं। यात्रा के दौरान नंदी घोष, तालध्वज और दर्प दलन रथों का अत्यंत भक्तिभाव से दर्शन किया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस शुभ समय में भगवान के रथ को खींचने मात्र से भी पुण्य फल प्राप्त होता है।
जगन्नाथ रथ यात्रा केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं बल्कि भारतीय संस्कृति की गहन आध्यात्मिक परंपरा का प्रतीक है। भगवान जगन्नाथ को विष्णु का अवतार माना गया है और उनका पुरी मंदिर चार प्रमुख धामों में शामिल है। मान्यता है कि इस यात्रा में सम्मिलित होने वाला भक्त जन्म मरण के चक्र से मुक्ति पाता है। सांस्कृतिक दृष्टि से भी यह उत्सव अत्यंत भव्य माना जाता है क्योंकि इसमें रंगारंग वाद्य, परम्परागत नृत्य, आस्था और एकता का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। दुनिया भर से आने वाले भक्त इस उत्सव को पुरी कार फेस्टिवल के नाम से जानते हैं।
रथ यात्रा के एक दिन पूर्व गुंडिचा मंदिर की सफाई की जाती है जिसे गुंडिचा मरजन कहा जाता है। इसके बाद यात्रा के प्रथम दिन छेरा पहरा की परम्परा निभाई जाती है जिसमें पुरी के गजपति महाराज रथ मार्ग को स्वर्ण झाड़ू से स्वच्छ करते हैं। यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ, सुभद्रा और बलभद्र को उनके भव्य रथों में गुंडिचा मंदिर तक ले जाया जाता है। यात्रा के चौथे दिन हेरा पंचमी मनाई जाती है जब माता लक्ष्मी भगवान जगन्नाथ को खोजने पहुंचती हैं। आठ दिन गुंडिचा मंदिर में रहने के बाद भगवान बहुदा यात्रा के साथ वापस पुरी लौटते हैं।
रथ यात्रा की प्रसिद्ध कथा के अनुसार एक बार गोपियों ने माता रोहिणी से कृष्ण की रास लीलाओं का वर्णन सुनने का आग्रह किया। उसी समय सुभद्रा बाहर पहरा देने के लिये खड़ी थीं और कृष्ण तथा बलभद्र भी वहीं पहुँचे। तीनों के एक साथ इस अद्भुत स्वरूप को देखकर नारद ने उनसे इसी रूप में दिव्य दर्शन देने का निवेदन किया। तीनों ने यह वरदान स्वीकार किया और तब से जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के संयुक्त स्वरूप की पूजा आरम्भ हुई। यही स्वरूप रथ यात्रा के दौरान तीनों रथों में विराजते हैं और भक्तों को पावन दर्शन प्रदान करते हैं।