उपनयन संस्कार, जिसे आमतौर पर जनेऊ संस्कार कहा जाता है, हिंदू धर्म के प्रमुख 16 संस्कारों में से एक है। जिसका अर्थ है “अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ना”। इसमें बालक को जनेऊ धारण कराया जाता है, जो धार्मिक और आध्यात्मिक जीवन की शुरुआत का प्रतीक है। जनेऊ तीन सूत्रों वाला पवित्र धागा है, जो ब्रह्मा, विष्णु और महेश का प्रतिनिधित्व करता है। मान्यता है कि उपनयन संस्कार के बाद ही बालक धार्मिक कार्यों में भाग ले सकता है। इस लेख में हम इसके महत्व, अर्थ और दिसंबर में जनेऊ संस्कार के शुभ मुहूर्त जानेंगे।
धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, जब ग्रहों और नक्षत्रों की स्थिति अनुकूल नहीं होती, तब जनेऊ संस्कार जैसे शुभ कार्य करने से परहेज़ करना चाहिए। ज्योतिष शास्त्र की मानें तो वर्ष 2025 में अगस्त से दिसंबर के बीच पंचांग और नक्षत्रों की स्थिति मुंडन के लिए उपयुक्त नहीं रहेगी, इसलिए इस अवधि में जनेऊ संस्कार न करने की सलाह दी जाती है।
जनेऊ हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण प्रतीक है, जो जीवन के विभिन्न पहलुओं को दर्शाता है। इसके तीन धागे त्रिमूर्ति के साथ-साथ देवऋण, पितृऋण और ऋषिऋण का प्रतिनिधित्व करते हैं। जनेऊ की विशेषता यह है कि यह जीवन के विभिन्न आयामों को जोड़ता है। यह सत्व, रज और तम का प्रतीक है जो जीवन के तीन मुख्य गुणों को दर्शाता है। साथ ही यह गायत्री मंत्र के तीन चरणों का प्रतीक है जो जीवन के तीन मुख्य उद्देश्यों को दर्शाता है। जनेऊ की प्रत्येक जीवा में तीन तार होते हैं, जो कुल नौ तारों का निर्माण करते हैं।
यह जीवन के नौ मुख्य तत्वों को दर्शाता है जो हमारे जीवन को समृद्ध बनाते हैं। जनेऊ में पांच गांठें रखी जाती हैं जो जीवन के पांच मुख्य उद्देश्यों को दर्शाती हैं। ये गांठें ब्रह्म, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का प्रतिनिधित्व करती हैं, जो जीवन के पांच मुख्य आयामों को दर्शाती हैं। जनेऊ की लंबाई 96 अंगुल होती है, जो जीवन के 96 मुख्य तत्वों को दर्शाती है। यह हमें जीवन के विभिन्न पहलुओं को समझने और उन्हें संतुलित करने के लिए प्रेरित करती है।