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गुरुवार देवी-देवता पूजा

गुरुवार देवी-देवता पूजा

Guruwar Devta Puja: गुरुवार क्यों होता है भगवान विष्णु को समर्पित? जानिए हरि नाम का रहस्य और विष्णु जी के शेषनाग पर लेटने का मतलब


हिंदू धर्म में सप्ताह के हर दिन का एक विशेष महत्व होता है और हर दिन किसी न किसी देवता को समर्पित होता है। गुरुवार का दिन भगवान विष्णु को समर्पित होता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन विष्णु जी की पूजा करने से जीवन के सभी कष्ट दूर होते हैं और सुख-समृद्धि आती है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि भगवान विष्णु को हरि क्यों कहा जाता है? और वे शेषनाग पर क्यों लेटे होते हैं? ऐसे में आइए जानते हैं क्यों शेषनाग पर लेटे रहते हैं भगवान विष्णु। साथ ही जानिए गुरुवार का दिन ही भगवान विष्णु की पूजा के लिए क्यों शुभ माना जाता है। 


इसलिए कहा जाता है हरि

शास्त्रों में कहा गया है कि 'हरि हरति पापानि' यानी हरि वह हैं जो हमारे पापों को हर लेते हैं। 'हरि' शब्द का अर्थ होता है 'हरने वाला' यानी जो दुःख, पाप और संकट को दूर करता है। भगवान विष्णु को इसलिए हरि कहा गया क्योंकि वे अपने भक्तों के सभी पाप और समस्याएं हर लेते हैं। जो भी व्यक्ति सच्चे मन से भगवान विष्णु की पूजा करता है, उसे हर परेशानी से राहत मिलती है। इसलिए भक्त उन्हें प्रेम से हरि, श्रीहरि और नारायण जैसे नामों से प्रेम और श्रद्धापूर्वक पुकारते हैं।


गुरुवार को ही विष्णु पूजा क्यों होती है?

पौराणिक मान्यता के अनुसार पक्षियों में सबसे विशाल गरुड़ को भगवान विष्णु का वाहन माना जाता है।  गरुड़ ने विष्णु जी को प्रसन्न करने के लिए कठोर तप किया था। उनकी तपस्या से खुश होकर भगवान विष्णु ने उन्हें अपना वाहन बना लिया। 'गुरु' का मतलब भी भारी होता है और गरुड़ भी भारी पक्षी है, इसलिए गुरुवार को भगवान विष्णु का दिन माना गया। इसके अलावा एक और मान्यता यह भी है कि देवताओं के गुरु बृहस्पति को भगवान विष्णु का स्वरूप माना जाता है। इसलिए भी गुरुवार का दिन विष्णु जी की आराधना के लिए खास है।


भगवान विष्णु शेषनाग पर क्यों लेटे होते हैं?

शास्त्रों में भगवान विष्णु को क्षीरसागर (दूध के समुद्र) में शेषनाग पर लेटे हुए दिखाया गया है। यह एक प्रतीकात्मक चित्र है। क्षीरसागर का मतलब है सुख और समृद्धि, जबकि शेषनाग विपत्तियों और दुख का प्रतीक है। इन दोनों के बीच भगवान विष्णु शांति से लेटे रहते हैं। इसका अर्थ यह है कि हमें जीवन में सुख और दुख दोनों को समान भाव से स्वीकार करना चाहिए। न तो सुख में बहुत ज्यादा खुशी मनानी चाहिए और न ही दुख में टूटना चाहिए।


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