कृष्ण जन्माष्टमी श्रीकृष्ण के अवतरण की रात्रि का पावन उत्सव है। भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी को जब रोहिणी नक्षत्र का संयोग बनता है, तब निशीथा काल में भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था। यही कारण है कि जन्माष्टमी की पूजा मध्यरात्रि के इस विशेष समय में ही की जाती है।
राखी पूर्णिमा भाई बहन के प्रेम को समर्पित पर्व है। श्रावण मास की पूर्णिमा को बहनें भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधती हैं और उनके लिए दीर्घायु और सुख का आशीर्वाद मांगती हैं। बदले में भाई बहन की रक्षा का वचन देते हैं। इसे राखी पूर्णिमा या राखरी भी कहा जाता है।
हिन्दू धर्म में नाग देवता को अत्यंत उच्च स्थान प्राप्त है। नाग पंचमी का पावन पर्व प्रतिवर्ष श्रावण शुक्ल पंचमी को मनाया जाता है। वर्ष 2026 में यह तिथि सोमवार 17 अगस्त को पड़ रही है। पंचांग अनुसार नाग पंचमी पूजा का शुभ समय प्रातः 05 बजकर 50 मिनट 59 सेकंड से 08 बजकर 28 मिनट 36 सेकंड तक रहेगा।
छठ पूजा उत्तर भारत का वह अनूठा लोकपर्व है जिसमें भगवान सूर्य और छठी मैया की आराधना की जाती है। बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश से आरंभ हुआ यह पर्व आज पूरे देश में आस्था का महोत्सव बन चुका है।
सावन भगवान शिव का अत्यंत प्रिय महीना माना गया है। यही कारण है कि श्रावण सोमवार व्रत को पूरे भारत में विशेष महत्व दिया जाता है। लेकिन हर वर्ष की तरह 2026 में भी सावन का आरंभ सभी राज्यों में एक-सा नहीं होगा।
दीपावली से एक दिन पूर्व आने वाली नरक चतुर्दशी को छोटी दिवाली, काली चौदस और रूप चौदस नामों से भी जाना जाता है। यह पर्व भगवान श्री कृष्ण और देवी काली की उस दिव्य विजय का प्रतीक है जब उन्होंने नरकासुर नामक अत्याचारी दैत्य का अंत कर हजारों स्त्रियों को मुक्त कराया था।
वट सावित्री व्रत हिन्दू विवाहित महिलाओं का अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व है। इस व्रत की परम्परा सावित्री और सत्यवान की प्रसिद्ध कथा पर आधारित है, जिसमें सावित्री ने अपने तप और सत्यनिष्ठा से मृत्यु देवता से अपने पति का जीवन वापस पाया था।
भारत के प्रमुख धार्मिक आयोजनों में जगन्नाथ रथ यात्रा का स्थान अत्यंत विशेष है। उडिसा के पुरी धाम में हर वर्ष आषाढ़ शुक्ल पक्ष की द्वितीया को भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा का भव्य रथ उत्सव निकाला जाता है। वर्ष 2026 में यह यात्रा गुरुवार 16 जुलाई को होगी।
सनातन परंपरा में वर्ष भर आने वाली चौबीस एकादशियों में से निर्जला एकादशी को सबसे अधिक फलदायी माना गया है। ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष में आने वाली यह एकादशी तप, संयम और श्रीहरि के प्रति समर्पण का महान प्रतीक है।
अक्षय तृतीया हिंदू धर्म की उन चुनिंदा तिथियों में से एक है जिसे बिना पंचांग देखे भी शुभ माना जाता है। वैशाख शुक्ल पक्ष की तृतीया को पड़ने वाली यह तिथि दान, व्रत, जप, यज्ञ, स्नान और नई शुरुआत के लिए सर्वोत्तम मानी जाती है।